क्या सारा ठीकरा ‘नेपोटिज़्म’ पर फोड़ना सही है?

वायरल वीडियो के बाद कई लोग कह रहे हैं कि बाबिल बॉलीवुड के कैंप्स और भाई-भतीजावाद से टूटे हैं. लेकिन इस बहस में एक कड़वी सच्चाई ये भी है कि बाबिल ख़ुद उसी व्यवस्था का हिस्सा हैं.

बाबिल ख़ुद भी उसी नेपोटिज़्म से फ़ायदा उठा चुके हैं. वो एक मशहूर एक्टर इरफ़ान के बेटे हैं.

वो इरफ़ान जिन्होंने वर्षों तक कड़ा संघर्ष किया और तब जाकर अपना मका़म बना पाए. शायद उसी विरासत के चलते बाबिल को इंडस्ट्री में वो शुरुआती जगह मिली, जो सैकड़ों प्रतिभावान कलाकारों को सालों की मशक्कत के बाद भी नहीं मिलती.

बात ये नहीं कि नेपोटिज़्म नहीं है. बात ये है कि क्या हम हर उलझन की जड़ वहीं तलाशते रहेंगे?

ये बात सही है कि सिनेमा की दुनिया को मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों को लेकर संवेदनशील होना चाहिए, लेकिन दुर्भाग्यवश हमारा पूरा समाज ही इस संवेदनशीलता से बहुत दूर है. और फ़िल्म इंडस्ट्री जो पहले ही भारी दबाव, अनिश्चितता और लगातार तुलना से भरी दुनिया है, वो मानसिक स्वास्थ्य के लिहाज़ से एक बेहद चुनौतीपूर्ण जगह बन जाती है.

सच्चाई यही है कि यह इंडस्ट्री हमेशा से ही कड़ी प्रतिस्पर्धा से भरी रही है और शायद आगे भी रहेगी. इसलिए बाबिल के हालिया व्यवहार को सिर्फ़ इंडस्ट्री की साज़िशों या भाई-भतीजावाद के चश्मे से देखना ग़लत होगा.

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